Bhojpuri News 24 में भोजपुरी मे पढ़ें- बनन में, बागन में, बगरयो बसंत है

 Bhojpuri News 24 में भोजपुरी मे पढ़ें- बनन में, बागन में, बगरयो बसंत है
BHOJPURI NEWS 24 :-
बसंती बयार बड़ी निरोग होले. पहिले क जमाना में लोग बाग़ जब जाड़ा से कठुवा जायं आउर महीन्ना भर बोखार ना उतरे त बसंती बयार क इंतजार करें. बसंती बयार क समय पेड़ से पुरान पतई झर जाले आउर नयी पतई आवे लागेले.

इ नईकी पतइया अईले से पेड़ क नकसा बदल जाला. माघ-पूस क बाद फागुन (बसंत) में पेड़ देखले पर अईसन लागेला जईसे कि उ पहिले धुरियायल रहल होखे आउर ओकरा बाद नहा के निकलल होखे. ठीक ओयिसन लागेला जईसन कि भुसउर से निकलल मनई नहईले की बाद लागेला.

सिवान त अईसे लहराले जईसे की लोग फगुवा में भांग पी के लहराला. आपन देश येह ममिला में बहुत अलगा ह. जईसे कि जवन मौसम होला, वोईसन खेती होले, वोईसन रंग पहिरल जाला, खायल जाला आउर सबसे बड़हर बात इ कि ओईसने रंग खेलल जाला, लगावल जाला.

बसंती बयार में फगुवा क खूब लहरा छूटेला. गांव-गिरांव में गईले पर बसंत पंचमी की दिने से रंग देखाए लगेला. पदीहा क बात सुनब त आप के लागी की इ बसंती बयार केतना नशीली होले. छोटमूट गारी देत केहू भेंटा सकेला. राम राम करेवाला मनई तनिको ना सकुचाला. बात-बात में फुलझड़ी छूटेले. ओकरी बाद अईसन ठहाका लागेला की जईसे कुछ नियामत चीज मिल गईल होखे.
अपनी देश क संस्कृति येह मामले में बहुत सुन्दर ह. खेती किसानी क परव से जेतना ताल्लुक ह ओतने मनई की व्यवहारो से. कवनो अदमी उदास मिल गयल त आप समझ लेईं की ओकरा फसल पर कवनो संकट ह. नहीं त सब हंसत-खेलत मिली.
येह मउसम क परभाव सभकी पर परेला. गोरु-बछरू त मकनाये-चोनराए लागेलन सो. चिरई-कउवा की चहकले में खुशी क सोता बहे लागेला. सबेरे कउवा त एतना उछल-कूद मचवेलन सो की कबो जुठहड़ी में कुछऊ ठीक से ना मिलेला. तोपले ना रहब त कउवा छींट के छिलछोबिल क दिहन सो. इ हमनी खातिन गन्दगी ह न, कउवा खातिन ख़ुशी ह. उ खाए में इ भूला जाला की हम छींटत हईं. एतने नाहीं, कउवा एतना बदमाश होला कि केहू आउर के खाए ना देत. आप उड़ावत रहा, मारत रहा, लेकिन भात/रोटी क एक्को दाना देखा गयल त कउवा क कुल डर भाग जाले. घर क छोट लईका गुरदेल से मारेलन त बुढ़-पुरनिया उड़-उड़ कईके उड़ावेलन. लेकिन कउवा ढीठ होलन सो. जल्दी सुनतन नाहीं. एतना जरूर ह कि सबेरे बड़ेर पर बईठ के कउवा तीन बार कॉव-कॉव कय दिहलस त लोग मान लेला की आज पहुना अइहन.
येह समय लोग सबेरे उठ के खेत में जात समय सोन चिरइया के खोजेलन. बुढ़-पुरनियां बतावें कि सबेरे ओकरा के देख लिहले से दिन जुड़ा जाला. बिगड़लो काम बन जाला. फर्गुद्दी क चूं-चूं त सबके भावेले. फुदुक के इहां, फुदुक के उहां.

दिन में घाम आउर सबेरे सांझी जाड़ा. बिहाने जब सूरज क रोशनी सीत पर पड़ेले तब आप देखतीं की केतना बढ़िया लागेला. ओही बिच्चे चिरई एहर से उड़ के ओहर आउर ओहर से उड़ के एहर भागेलिन सो. लेकिन उ भागेलिन नाहीं. उड़ले में उनहन के बहुत आनंद आवे ला. तब्बे त खन एहर, खन ओहर घूम लेलीं सो. जब झुण्ड में आवेलीं सो तब केतना सुन्दर लागेला. उड़त समय पखिया क अवाज आवे ले त अईसन लागेला जईसे कि कवनो लोक-धुन बाजत होखे.
इ फगुनहटा बयार निरोग होले. साथ में शुरुआत में फसल लहरा लेले लेकिन जईसे इ बयार गंभिराले, जेठ की तरफ बढ़ेले, हरियरी पकहर रूप में बदले लागेले. जईसे की सबसे पहिले पाकेला तेलहन, मतलब कि राई, सरसो, तीसी. ओकरा बाद पाकेला जव, गोहू, चन्ना. अब त साधन अइले से खेती-किसानी तनी सुधर गइल बा. किसानन के खईले-पियले क संकट ना ह. पहिले एतना साधन ना रहे. पैदावार बहुत कम होखे. अधपक फसल लोग उखारे-पखारे लागें. कुछ लोग त अभाव में दुद्धा फसल उखर के ले आवें. ओकरा के ढूंढा बनाय के खायं.

जव/गोंहू क उम्मी होरहा आउर कचरस पर आधा दिन काट दें. जईसे जईसे काम बढ़े, ओईसे-ओईसे खईले-बनवले क दिकत होखे लागे. केहू समय ना दे पावे. अइसना में होरहा, रस, कचरस, माठा, आलू क सहारा रहे. इहे कुल खा के खेती में काम करे वाला दिन काट दें. बिरले लोग रहे जिनकरा घरे सकेत ना रहे.

एही समय फलन क राजा आम में बउर लागेला. बगईचा महक जाला. सबेरे पुरवाई बहेले. दिन में चउवाई बहेले. जब सांझ ढरकेले त पछुवा शुरू हो जाला. एक घड़ी रात गईले गुलाबी जाड़ा पड़े लगेले. भोरहरी में जवन झुरझुरी शुरू होले उ एक तरफ काया के निरोगी बना देले, आउर दूसरी तरफ तनिको ढेर भईल त अदमी के बोखार आ जाला. छोट लईकन के इ हवा बड़ी जल्दी लागेले. त इ मउसम बहुत नीक होला आउर बहुत जबुनो होला.
उतरत फगुनहटा दिन रुक्खर होखे लागेला. सुरुज भगवन क आंख गरम लागेले. खेत-खलिहान में सबेरे साझे क काम रह जाला. घाम ना सहाला. लेकिन खेती अईसन चीज हीय की आप के समय की संग्हे चले के परेला, परेला. एक्को दिन आगे-पीछे भईल त बनल अनाज घरे में ना पहुंची. किसान येह मौसम में सबसे ढेर खुशहाल रहेला. एसे की दलहनी मिलेले न. इ खाली साल भर क खरची ना होले. एही से पता चलेला कि साल कईसे कटी. केतना बा आउर केतना जुटावे के परी. फगुनहटा अइसहीं गावत-झूमत निकल जाला. गईले की पहिले खेत खलिहान साफ करवाके कुल घर में रखवा देला. उतरत फगुनहटा खेत में नई फसल फिर से लहलहाए लागेले.
जब चईत चढ़ेला त फिर से लहरा शुरू हो जाला. सबसे भीड़ क दिन इहे होला. लोगन क खायल-सुतल दूभर हो जाला. कटिया आउर दवरी किसान की सर पर सवार हो जाले. लेकिन किसान अईसन होला की पूछा मत. येह भीड़ में कुल भईले की बाद चइता क तान सजेले. लहरा छूटेला…..कईसे के होई कटनिया ये रामा, पिया घरे नाहीं….. येही लहारबहार में जियत-करत फगुनहटा खतम हो जाला आउर गरमी चढ़ जाले.

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