हार नहीं मानी, रार नहीं ठानी! संघर्ष की भट्टी में तपकर 'कुंदन' बने संजय सिंह 'टाइगर'। जानिए, कैसे एक प्रवक्ता से 'माननीय मंत्री' तक का सफर तय किया आरा के विधायक ने। Bihar News 24

हार नहीं मानी, रार नहीं ठानी! संघर्ष की भट्टी में तपकर 'कुंदन' बने संजय सिंह 'टाइगर'। जानिए, कैसे एक प्रवक्ता से 'माननीय मंत्री' तक का सफर तय किया आरा के विधायक ने। 
भोजपुर की राजनीति में आज जश्न का माहौल है। आरा सदर से नवनिर्वाचित विधायक  संजय सिंह 'टाइगर' का नीतीश कैबिनेट में मंत्री बनना  तय हो चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह कुर्सी उन्हें विरासत में नहीं, बल्कि वर्षों के तप और त्याग के बदले मिली है?

आइए, नजर डालते हैं 'टाइगर' के उस सियासी सफर पर जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है:

🚩 1. लोजपा से शुरुआत और 2010 का 'पहला धमाका'
संजय सिंह ने अपनी राजनीति की शुरुआत लोजपा (LJP) से की थी, लेकिन उनकी मंजिल भाजपा थी।
वर्ष 2010 में भाजपा ने उन्हें  संदेश विधानसभा से टिकट दिया। उस समय वहां बाहुबलियों का बोलबाला था, लेकिन संजय सिंह ने निर्दलीय बाहुबली और राजद के किले को ध्वस्त करते हुए पहली बार जीत दर्ज की और विधानसभा पहुंचे।

📉 2. जब समय ने ली परीक्षा (2015-2020 का संघर्ष)
राजनीति में असली परीक्षा हार के बाद होती है।
2015: वे राजद की लहर में संदेश सीट हार गए।
2020: पार्टी ने फिर भरोसा जताया, लेकिन वे फिर चुनाव हार गए।

अक्सर दो बार हारने के बाद नेता या तो पार्टी बदल लेते हैं या घर बैठ जाते हैं। लेकिन संजय सिंह 'टाइगर' अलग मिट्टी के बने थे। वे न बागी बने, न निराश हुए। वे संगठन में और मजबूती से डटे रहे।

🗣️ 3. पार्टी की 'आवाज' बने (संगठन के सिपाही)
विधायक न रहने के बावजूद भाजपा ने उन्हें प्रदेश प्रवक्ता बनाया। जब भी टीवी डिबेट्स में भाजपा को घेरने की कोशिश होती, संजय सिंह अपनी कड़क आवाज और तर्कों से विरोधियों को चुप करा देते। वे सड़क से लेकर स्टूडियो तक पार्टी के लिए लड़ते रहे।

🎯 4. 2025 का 'मास्टरस्ट्रोक' और आरा की जंग
2025 के चुनाव में भाजपा ने अपना सबसे बड़ा दांव खेला। आरा सदर जैसी हॉट सीट से 5 बार के अजेय विधायक और पूर्व मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह का टिकट काटकर संजय सिंह को मैदान में उतारा गया।
यह एक बड़ा जोखिम था। एक तरफ पार्टी के भीतर की नाराजगी का डर, दूसरी तरफ माले (CPI-ML) का मजबूत कैडर। लेकिन 'टाइगर' ने साबित कर दिया कि संगठन का फैसला सही था। उन्होंने माले को पटखनी दी और आरा में भगवा लहराया।

🐅 5. क्यों मिली कैबिनेट में जगह?
संजय सिंह का मंत्री बनना सिर्फ एक जीत का इनाम नहीं है, यह उस वफादारी (Loyalty) का सम्मान है जो उन्होंने बुरे वक्त में पार्टी के प्रति दिखाई। उनकी सवर्ण (राजपूत) समाज में पकड़ और फायरब्रांड छवि ने उन्हें इस पद का हकदार बनाया है।

भोजपुर के लाल और आरा के विधायक को इस नई जिम्मेदारी के लिए बहुत-बहुत बधाई! उम्मीद है कि वे मंत्री बनकर क्षेत्र के विकास में चार चांद लगाएंगे।

संजय सिंह 'टाइगर' के इस जुझारू सफर पर आपकी क्या राय है? 
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